बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था। उन दिनों मैं अपने गृह-नगर कोटा में रहता था। वहाँ मुझे अक्सर किसी शादी-समारोह में जाने का अवसर मिलता था। जैसे ही कहीं खाने का न्योता मिलता, तो मैं रोमांचित हो जाता। सोचता आज तो बढ़िया पकवान मिलेंगे- जैसे श्रीखंड, बाफला, पुलाओ, लहसुन की चटनी, नुक्ती इत्यादि। ऐसा नहीं है की मुझे घर का खाना पसंद नहीं था, पर समारोह या फंक्शन में कुछ अलग मिलता था जो आप रोज़ नहीं खाते इसलिए उसकी बात कुछ और थी।
कोशिश ये रहती की भाई-बंधुओं या और रिश्तेदारों के साथ पंगत में बैठा जाए। कभी कभी तो शुरुआती पंगत में ही बैठने का मौका मिल जाता। कभी पंगत भर जाती थी, तो थोड़ा इंतज़ार करना पड़ता था। जब तक नंबर नहीं आता, तब तक परोसगारी करने में भी बड़ा आनंद आता था। परोसगारी मैं खाना खाने के बाद भी कुछ देर करता, जब तक कि घर वाले घर चलने के लिए नहीं कहते। छोटा बच्चा होने की वजह से मुझे ज़्यादातर बड़ी बाल्टियां, जिनमे सब्जी होती थी, वो नहीं पकड़ाई जाती थी। तो मैं आसान ऑप्शन – जैसे कि पत्तल दूने गिलास बांटना, फिर पूड़ी बांटना जैसे काम करता था। और सबसे ज़्यादा मैंने अगर कोई जिम्मेदारी निभाई तो वो थी पानी भरने की। इसकी दो वजह थी – पहला एक तो यह नेकी का काम है क्यूंकि जब इंसान को दाल, सेवड़े, और सब्जी में मिर्ची लगती थी, जो की हमारे राजस्थान में भर-भर के डाली जाती है, तो वो बेचैन होकर पानी-पानी चिल्लाता रहता। दूसरा पानी भरना सबसे सेफ ऑप्शन होता था – जहाँ गिलास खाली दिखे, उसे तुरंत भर दो। कोई किसीसे पूछने का झंझट ही नहीं – क्यूँकि पानी तो हर इंसान को चाहिए, मुँह में मिर्ची से उत्पन्न हुई जलन को मिटाने के लिए और खाना खत्म होने के बाद पत्तल में ही हाथ धोने के लिए।
एक बार की बात है- मैंने सबसे खतरनाक चीज़ परोसगारी के लिए उठा ली – वो था “नमक”। नमक के मामले में ज़्यादातर लोग बड़े तुनकमिज़ाज होते हैं। वैसे भी नमक न हो, तो सारी सब्जी, पूड़ी, चटनी, पुलाओ, इत्यादि सब बेकार है। नमक कितना डालना है, अगर रसोइये को ये नहीं पता, तो सारा किया हुआ काम धरा का धरा रह जाता है। नमक का हिंदी सिनेमा में भी डायलाग- बाज़ी में बड़ा ही महत्व है – आपने सुना ही होगा पुरानी फिल्मों में- “नमक-हरामी” और “नमक-हलाली” जैसे शब्दों का प्रयोग इंसान की स्वामी-भक्ति और राष्ट्र-भक्ति को मापने के लिए किया जाता था। एक बार एक बहुत सीनियर सरकारी अधिकारी ने मुझ जैसे प्रशिक्षु अफसरों को नसीहत देते हुए कहा था – “अब फील्ड में आ गए हो, तो थोड़ी नमक-हलाली दिखाओ”। खैर ये बात कभी और।
तो मैंने गलती से एक बार नमक का दूना उठाया और निकल पड़ा नमक परोसने। नमक का नंबर परोसगारी में बहुत सोच समझकर चलाना पड़ता है- ना बिलकुल शुरू में, और न खाने के अंत में। नमक जाता है, सब्जी परोसने के तुरंत बाद। तो मैं निकला नमक लेकर, चुटकी में नमक लेता और पत्तल के एक कोने में रखता जाता। वैसे नमक परोसने में एक आसानी भी है कि किसीसे पूछना नहीं पड़ता रखें कि नहीं – क्यूंकि ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, पड़ा रहेगा एक कोने में अगर इस्तेमाल नहीं किया गया। ज़्यादातर लोग इंतज़ार करते है नुक्ती, बाटी, बाफले, पूड़ी, श्रीखंड या कत का, नमक तो तब चाहिए जब कम हो। पर नमक परोसने में एक बहुत बड़ा खतरा भी है – अगर रखने में थोड़ी सी भी भूल चूक हुई या गलती से सब्जी के पास रख दिया, तो खाने की ऐसी की तैसी कर सकता है। पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, मुझसे एक नई तरह की गलती हो गयी। एक सज्जन को नमक परोसते हुए जब मैंने देखा की उसकी पत्तल भरी हुई है, तो मुझे कोने में खाली जगह नहीं दिखी, मजबूरन मैंने पत्तल के बीचों- बीच नमक रख दिया, और अगले ही क्षण सज्जन का जैसे सारा का सारा खाने का सुख-चैन ही लुट गया, वो मेरे ऊपर चिल्लाया और बोला– “लड़के नमक बीच में नहीं रखते, पता नहीं है क्या?” मैं वहां से भागा और नमक के दूने को वापस ठिकाने पे रखा। वो तो सज्जन इतने पर ही रुक गया, वरना होने को तो कुछ भी बवाल हो सकता था।
फिर मैंने कसम खायी की अब से नमक की परोसगारी नहीं करूँगा, और वापस अपने सेफ ऑप्शन पानी की तरफ रूख किया और चलता बना पानी बांटने……
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